DNA प्रोफाइलिंग बिल: क्या मोदी सरकार आपके डीएनए का डेटा बैंक बनाने की कर रही तैयारी?

2 months ago 1007
बिहार चुनाव का वक्त था ,मुजफ्फरपुर के परिवर्तन रैली को संबोधित करते हुए देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि लालू आज जहर पी रहे हैं। मैंने तो तब ही जहर पीया था। राजनीति में इतनी छुआछूत कि कोई भोजन पर बुलाकर थाली छीन ले। मन में बहुत चोट लगी थी, लेकिन चुप रह गया। लेकिन मांझी पर चोट हुआ एक महादलित का अपमान हुआ तो लगा कि नीतीश कुमार के डीएनए में ही कोई गड़बड़ी है। इस बयान को नीतीश ने बिहार के अपमान से जोड़ कर बिहार के डीएनए पर सवाल उठाने की बात कही। आप कह रहे होंगे कि ये तो काफी पुरानी बात है। इसका जिक्र आज क्यों हम कर रहे हैं। तो आपको बता दें कि आज का विश्लेषण हम आने वाले वक्त में नए कानून का रूप लेने की कतार में लगे डीएनए प्रोफाइलिंग (उपयोग और अनुप्रयोग) विनियमन विधेयक की करेंगे। जिसको लेकर संसद की एक समिति ने कुछ बिंदुओं का उल्लेख करते हुए चिंता व्यक्त की है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश की अध्यक्षता वाली विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन पर संसद की स्थायी समिति से संबंधित 32 सदस्यीय विभाग ने अपनी रिपोर्ट राज्यसभा के पटल पर रखी। समिति की ओर से कहा गया कि ये डर पूरी तरह से निराधार नहीं है और सरकार एवं संसद द्वारा इसका समाधान निकाला जाना चाहिए। समीति का मानना है कि डीएनए प्रोफाइलिंग सुनिश्चित करने के लिए एक ऐसा सक्षम तंत्र जल्द ही बनाया जाए, जो पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों और संविधान की भावना के अनुरूप हो। समिति के सदस्यों और इसके सामने पेश हुए कई सांसदों ने इस बात की आशंका जाहिर की है कि धर्म, जाति या राजनीतिक विचार के आधार पर लोगों को निशाना बनाने के लिए इस कानून का दुरुपयोग किया जा सकता है। डीएनए टेस्टिंग का नाम आते ही दिमाग में दो बातें घूमने लगती हैं। एक अपराधी को डीएनए टेस्ट से कैसे पकड़ा गया और दूसरा ये कि वो व्यक्ति किसी का असली बेटा है या नहीं? डीएनए के बारे में सरल भाषा में कहे तो इंसान के शरीर का ब्लूप्रिंट। मतलब इंसान दिखता कैसा है, आंखों का रंग क्या होगा। ब्लड ग्रुप क्या होगा, कौन सी बीमारी हो सकती है। एक इंसानी शरीर के तौर पर आपकी बनावट को डीएनए तय करता है। इंसानों में 99.9 फीसदी डीएनए एक जैसे होते हैं और जो 0.1 फीसदी अंतर होता है वही आपको दूसरे से अलग बनाता है। आज डीएनए टेस्टिंग और डीएनए प्रोफाइलिंग विधेयक का एमआरआई स्कैन करेंगे। 
फिल्मी कहानी हो या टेलीविजन सिरियल का दौर विलेन ढाढ़ी-मूंछ लगाया और पहचान, भेषभूषा बदलकर पुलिस की निगाहों से बच निकला। वहीं टेलीविजन जगत में तो एक ही शख्स की इतनी बार प्लास्टिक सर्जरी हो जाती है कि जितने लोग अपने मोबाइल फोन नहीं बदलते। लेकिन इस बिल के बाद ऐसा करके कानून और पुलिस के हाथों बच पाना मुमकिन नहीं हो पाएगा। 

इसे भी पढ़ें: भाकपा ने सरकार पर साधा निशाना, कहा- आर्थिक संकट के लिए ईश्वर को कोसना उचित नहीं, केंद्र की नीतियां जिम्मेदार

1985 में पहली बार कानूनी कार्रवाई में डीएनए जांच को मान्यता मिली लेकिन तब से लेकर अब तक कोई ठोस कानूनी ढांचे का निर्माण नहीं हो पाया। इसकी शुरुआत तो 2003 से ही हो गई थी लेकिन इसको लेकर कई सवाल उठे थे। सवाल निजता का था, सवाल मानवाधिकार का है, सवाल अंतरराष्ट्रीय कानूनों का भी है। इन्हीं सवालों में डीएनए प्रोफाइलिंग को सरकारी जामा पहनाए जाने की कोशिशें उलझती रही। ये मामला इतना पेचीदा है कि सरकार 2007, 2012, 2015, 2016 और 2017 में कई ड्राफ्टों में संशोधन किया है। ऐसे में ये जानना जरूरी है कि क्या हैं इस बिल के प्रावधान?
देश में हर साल लाखों लावारिश लाशें मिलती हैं। लेकिन लापता लोगों और लावारिश लाशों के मिलने का न तो कोई कानूनी तंत्र है और न कोई आंकड़ा। सवाल ये कि पहचान कैसे हो? देश में आपदाओं में हर सला सैकड़ों लोगों की मौत हो जाती है और हजारो लोग लापता हो जाते हैं। इनमें से कई मामलों में न तो पहचान हो पाती है और न ही लापता लोगों की जानकारी। देश में इस वक्त सैकड़ों ऐसे आपराधिक मामले हैं जो अनसुलझे होंगे। उनकी गुत्थी आखिर कैसे सुलझेगी। इन तमाम सवालों का जवाब डीएनए जांच बहुत हद तक देती है। साल 2015 में जनवरी के महीने में उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के परियर घाट पर 200 लाशें गंगा में तैरती नजर आईं। अभी इसको लेकर चर्चा जारी ही था कि इसी जिले की पुलिस लाइन से तकरीबन 100 नरकंकाल बरामद हुए। इसके कुछ ही दिन बाद यूपी के ही मुरादाबाद, बहराउच में भी पुलिस लाइन से कंकाल बरामद हुए। कई कोशिशें हुई लेकिन इस बात का पता नहीं लग पाया कि ये लाशें और कंकाल किसके थे? बाद में कहा गया कि ये वो लावारिश लाशें थी जो पोस्टमार्टम करने के बाद अपने वारिशों का इंतजार कर रही थीं। लेकिन इनका इंतजार कभी खत्म नहीं हुआ और फिर जैसे जैसे वक्त बीता इन लाशों की पहचान भी नामूमकिन हो गई। जस्टिस कौल की तरफ से एक बात रखी गई थी कि जब कोई व्यक्ति लापता होता है तो उसके फैमली मेंबर का डीएनए लेकर रख लिया जाएगा और उसका एक बैंक क्रिएट कर दिया जाएगा। फिर कोई लापता लाश मिलने पर उस बैंक से प्रोफाइलिंग कर सकते हैं। 

इसे भी पढ़ें: विपक्ष पर बरसे नरेंद्र तोमर, कहा- खून से खेती सिर्फ कांग्रेस कर सकती है, भाजपा नहीं

डीएनए प्रोफाइलिंग क्या है?
प्रोफाइलिंग मतलब किसी इंसान की पहचान की फोरेंसिक तकनीक। सबसे पहले थानों में अपराधियों की फोटो होती थी। फोटो देखकर किसी को पहचाना जा सकता था। अब स्कीन, लार, ब्लड या बाल के उसकी प्रोफाइल बनाई जा सकती है। आपराधिक जांच, माता-पिता की पहचान के लिए और लापता लोगों की खोज जैसे विभिन्न उद्देश्यों के लिए डीएनए परीक्षण का उपयोग पहले से ही किया जा रहा है। प्रस्तावित कानून इन कार्यों को एक पर्यवेक्षी संरचना के तहत लाने की कवायद करता है। जिससे दिशा निर्देशों और नियमों का पालन हो और डीएनए प्रौद्योगिकी का दुरुपयोग न हो। इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए बिल में दो संस्थागत ढांचे स्थापित करने का प्रस्ताव है। पहला- राष्ट्रीय स्तर पर एक डीएनए नियामक बोर्ड और दूसरा-  एक डीएनए डेटा बैंक। बोर्ड के क्षेत्रीय केंद्रों के साथ-साथ राज्य स्तर पर भी डेटा बैंक की स्थापना की जा सकती है। मुख्य नियामक प्राधिकरण वाली बोर्ड डीएनए कलेक्शन, टेस्टिंग और स्टोरेज के लिए नियमों और दिशानिर्देशों को लागू करेगा। जबकि डेटा बैंक निर्दिष्ट नियमों के तहत विभिन्न लोगों से एकत्र किए गए सभी डीएनए सैंपल स्टोर करेगा। विधेयक का प्रस्ताव है कि डीएनए सैंपल्स की टेस्टिंग केवल नियामक बोर्ड द्वारा अधिकृत लैब में की जा सकती हैं। यह उन परिस्थितियों को भी निर्दिष्ट करता है जिनके तहत किसी व्यक्ति को डीएनए सैंपल देने के लिए कहा जा सकता है। 
डीएनए से जुड़े चर्चित मामले
दिल्ली के तंदूर हत्याकांड में डीएनए विश्लेषण की प्रमुख भूमिका थी। वरिष्ठ नेता नारायण दत्त तिवारी और उनके जैविक पुत्र रोहित शेखर के मामले में भी डीएनए विश्लेषण की अहम भूमिका रही थी। इसके अलावा मुजफ्फरपुर नवरुणा मामले में भी इस जांच का सहारा लिया गया। 
जिन उद्देश्यों के लिए इस तरह के अनुरोध किए जा सकते हैं
प्रस्तावित कानून के प्रावधानों के अनुसार पुलिस अपराध के आरोपी व्यक्ति के डीएनए सैंपल मांग सकती है ताकि उनकी जांच सुगम हो सके। लेकिन जब तक अपराध बहुत गंभीर प्रवृति का न हो जिसमें मौत की सजा या कम से कम सात साल की कैद की सजा न हो। डीएनए सैंपल आरोपी की लिखित सहमति पर ही प्राप्त किया जा सकता है। अपराध की जांच के लिए डीएनए परीक्षण नितांत आवश्यक होने की स्थिति में इसे मजिस्ट्रेट की अनुमति से भी कलेक्ट किया जा सकता है। जो लोग किसी अपराध के गवाह हैं, या अपने लापता रिश्तेदारों का पता लगाना चाहते हैं। या इसी तरह की अन्य परिस्थितियों से संबंधति लोग लिखित सहमति के मध्यम से अपने डीएनए सैंपल देने के लिए आमंत्रित हैं। 
अब तक क्या हुआ है
 2003 में डीएनए प्रोफाइलिंग कमेटी बनी। 2007 में ये बिल ह्यूमन प्रोफाइलिंग बिल के तौर पर सामने आया। लेकिन संसद तक नहीं पहुंच सका। 2012 में नया बिल आया लेकिन पहले ही लीक हो गया। 2017 में इसका नया मसौदा सरकार को सौंपा गया। इसे कैबेनेटने मंजूरी दी। 8अगस्त 2018 को इसे लोकसभा में पेश भी किया गया लेकिन वह लैप्स हो गया।

इसे भी पढ़ें: किसानों के मुद्दे पर लोकसभा में फिर हुआ हंगामा, जानिए संसद में दिनभर क्या कुछ हुआ

विरोध करने वालों को दिक्कत क्या है
प्रस्तावित कानून पर मुख्य बहस लगभग तीन मुद्दों पर है। क्या डीएनए टेक्नालाॅजी फुलप्रूफ है? क्या प्रावधान डीएनए जानकारी के दुरुपयोग की संभावना को पर्याप्त रूप से संबोधित करते हैं और क्या व्यक्ति की निजता सुरक्षित है। डीएनए की जानकारी बेहद चौंकाने वाली हो सकती है। यह न केवल किसी व्यक्ति की पहचान स्थापित कर सकता है, बल्कि व्यक्ति की शारीरिक और जैविक विशेषताओं जैसे कि आंख, बाल या त्वचा का रंग, रोगों के लिए संवेदनशीलता, संभव चिकित्सा इतिहास से जुड़ी जानकारी इससे पता लग सकती हैं। इसके साथ ही और जैविक रिश्तेदारों के लिए संभावित सुराग भी प्राप्त हो सकते हैं। कुछ वर्ष पूर्व विधेयक के आलोचकों ने दावा किया कि इस तरह की जानकारी एकत्र करने और संग्रहीत करने से किसी व्यक्ति की निजता का हनन होने के अलावा, दुर्व्यवहार भी हो सकता है। दूसरी ओर, सरकार तर्क दे रही है कि चूंकि डीएनए परीक्षण पहले से ही हो रहे हैं, और अक्सर इसे स्थापित करने के लिए सबसे विश्वसनीय उपकरण के रूप में उपयोग किया जाता है। सरकार का तर्क है कि विनियामक सुरक्षा उपायों को रखना बेहतर होगा ताकि यह केवल निर्धारित तरीके से और अधिकृत कर्मियों और संस्थानों द्वारा ही किया जा सके।
बहरहाल, ये केवल कानून व्यवस्था का मामला नहीं बल्कि हमारी संवेदनाओँ से भी जुड़ा सवाल है। धर्मों में शव की अंतिम क्रिया का हक परिवार के करीबी रिश्तेदारों का है। लेकिन कई बार लाशों की पहचान स्थापित नहीं हो पाती या पुलिस काम के दावब में उतनी तत्परता नहीं दिखाती। ऐसे में बड़ा सवाल कि लाशों की पहचान कैसे हो। डीएनए प्रोफालिंग इस दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है। - अभिनय आकाश

Read Entire Article